सर्वोत्तम Boooook 1008
महामारी भयावह है या उसे समझने का विज्ञान नहीं है ?
महामारी का स्वरूप ही इतना भयावह था कि उसे समझना या उसके विषय में कोई भी जानकारी जुटाना या अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना संभव ही नहीं था या फिर किए जा रहे वैज्ञानिक अनुसंधानों में ये क्षमता ही नहीं थी कि उनके द्वारा महामारी को समझना संभव हो पाता |कहीं ऐसा तो नहीं है कि जिस वैज्ञानिक प्रक्रिया का अनुशरण करके महामारी जैसे अत्यंत भयंकर महारोग को समझना संभव ही नहीं है उसी प्रक्रिया के आधार पर महामारी को समझने के प्रयास किए जाते रहे | महामारी को ठीक ठीक समझने के लिए कोई विज्ञान है भी या नहीं !
पिछले कुछ सौ वर्षों से प्रत्येक सौ वर्षों के अंतराल में महामारी को आते देखा जा रहा है | हर बार जन धन की हानि होती रही है उसे कम करने या उससे पूरी तरह से बचाव करने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान भी होते रहे हैं | उन अनुसंधानों से कुछ तो अनुभव ऐसे मिले ही होंगे जो महामारी से बचाव की दृष्टि से मददगार होने चाहिए थे ऐसी केवल आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास भी था कि वर्तमान समय में विज्ञान इतना उन्नत है कि अब यदि महामारी आएगी भी तो उसकी पीड़ा से समाज को पहले की तरह नहीं जूझना पड़ेगा |अब तो विज्ञान बहुत तरक्की कर चुका है |
कोरोना काल में यह सभी ने देखा था कि वैज्ञानिकों को महामारीविज्ञान के
विषय में जो जानकारी थी उसके अनुसार वे प्रयत्न पूर्वक महामारी के विषय
में जो भी अनुमान या पूर्वानुमान लगाते जा रहे थे वे सबके सब गलत निकलते जा
रहे थे | बार बार ऐसा क्यों हो रहा है इस विषय में वैज्ञानिकों के द्वारा कोई ऐसा संतोषजनक उत्तर नहीं दिया जा सका है जिससे समाज का भय कुछ कम करने में मदद मिलती |
महामारी संबंधित वैज्ञानिक अनुसंधानों की कमजोरी के कारण वैज्ञानिकों के
द्वारा महामारी के विषय में समय समय पर दिए जाते रहे वक्तव्य जब जब गलत
निकलते रहे तब तब इसका कारण वैज्ञानिक अनुसंधानों
की असफलता स्वीकार करने के बजाए महामारी के स्वरूप को ही परिवर्तित एवं और अधिक भयावह बता दिया
जाता रहा | इससे जनता का भय और अधिक बढ़ता जा रहा है |
महामारी बहुत भयंकर थी यह कहना तब तक उचित नहीं होगा जब तक महामारी के विषय में हमारी जानकारी कितनी थी | यह स्पष्ट नहीं होता है | परीक्षा का प्रश्न पत्र कठिन
था यह कहने का अधिकार केवल उसी विद्यार्थी को होता है जिसने पाठ्यक्रम में निर्धारित किए गए अपने विषय को ठीक से पढ़ा हो| जिसने विषय ही न पढ़ा हो उसे जानकारी के अभाव में सब कुछ कठिन ही लगेगा |
इसलिए गंभीर चिंतन पूर्वक यदि सोचा जाए तो महामारी की भयावहता को तो तभी दोषी माना जा सकता है जब यह पता लगे कि महामारी विज्ञान के विषय में हमारी जानकारी कितनी थी |महामारी के स्वभाव को समझने में हम कितने प्रतिशत सफल हुए और जितने प्रतिशत सफल हुए उसके आधार पर कोरोना महामारी के विषय में ऐसे कौन कौन से अनुमान पूर्वानुमान आदि बताए जा सके जो सच भी निकले हों | उनके द्वारा महामारी के कारण होने वाली संभावित जनधन हानि को कितने प्रतिशत बताया जा सका | यदि वे अनुसंधान न हुए होते तो इस इस प्रकार से नुक्सान की मात्रा इससे भी अधिक बढ़ सकती थी |
ऐसा कहने के पीछे हमारे पास आधारभूत कुछ ऐसे अनुसंधान जनित अनुभव हैं जिनसे ऐसा लगता है कि महामारी को ठीक ठीक समझना एवं उसके विषय में सही सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना संभव है |जिन अनुसंधानों से महामारी का कोई संबंध ही नहीं है उनसे महामारी को समझा जाना कैसे संभव है |महामारी के विषय में जो भी अनुसंधान किए गए उनकी सार्थकता तभी है जब उनके आधार पर महामारी के विषय में जुटाई गई जानकारी या लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान आदि सही सिद्ध हों |
इसका प्रभाव वैक्सीन लगाते समय समाज में दिखाई भी पड़ा !समाज का एक वर्ग शुरू में वैक्सीन पर विश्वास करने को ही नहीं तैयार नहीं था |समाज को लगता था कि जिन वैज्ञानिकों के द्वारा रोग को ही नहीं समझा जा सका वे उसकी कोई औषधि टीका आदि का निर्माण कैसे कर सकते हैं जबकि चिकित्सा सिद्धांत के अनुसार किसी भी रोग से बचाव या मुक्ति दिलाने के लिए किसी औषधि का निर्माण करना तभी संभव है जब उस रोग की प्रकृति को भली प्रकार समझा जा चुका हो |
अनुसंधानों का असमंजस
कोई ताला किसी चाभी से खोलने पर न खुले तो इसका मतलब
यह नहीं होता है कि ताले में ही खराबी है अपितु इसका मतलब यह भी होता है कि वह चाभी इस ताले की हो ही न | जिससे उस ताले को खोलने का प्रयास किया जा रहा है |
कोई अन्य व्यक्ति किसी दूसरी चाभी से यदि वही ताला खोल और बंद कर लेता है तब तो यह बात पक्की हो जाती है कि ताले में कोई खराबी नहीं है अपितु जिस चाभी से खोलने का प्रयास किया जा रहा है वह चाभी ही उस ताले की नहीं है जिससे उसे खोलने के प्रयत्न किए जा रहे हैं |
इसके
लिए यह तर्क देना उचित नहीं है कि कई दिन से ताले को खोलने के प्रयत्न हो रहे थे किंतु ताला खुल नहीं रहा था | इसलिए इस विषय में वैज्ञानिकों ने उसी चाभी से ताला खोलने की रिसर्च करना शुरू किया | उस रिसर्च को पूरा करने के बाद वैज्ञानिकों ने बताया कि ताला अपना स्वरूप बदलता जा रहा है |इस स्वरूप परिवर्तन के कारण ही ताला अब पुरानी चाभी से नहीं खुल रहा है यदि ऐसा न होता तो ताले को उसी चाभी से खुल जाना चाहिए था जो चाभी हमारे पास है | भले उस चाभी का इस ताले से कोई संबंध ही
न हो |
ऐसी परिस्थिति में तमाम चाभियाँ बदल बदल कर बार बार ताला खोलने का प्रयास करने पर भी ताले के न खुलने का मतलब यह नहीं कि ताला और अधिक खतरनाक होता जा रहा है या ताले का कोई वेरियंट बदल रहा है या उसका जलवायु परिवर्तन हो रहा है | हजारों चाभियों के द्वारा जो ताला नहीं खुला वो उसके बाद भी अपनी चाभी से उसी प्रकार आसानी से खुल जाता है जैसा हजारों
चाभियों से प्रयत्न करने के पहले अपनी चाभी से खुल सकता है क्योंकि समस्या
ताले के खतरनाक होने या वेरियंट बदलने की नहीं थी अपितु ये तो सामान्य बात है कि किसी भी ताले को उसकी अपनी चाभी से खोला जाए तभी खुलेगा | उसी पाले को उसकी अपनी चाभी से न खोलकर किन्हीं दूसरी लाखों करोड़ों चाभियों से खोलने का प्रायः किया जाए तो भी नहीं खुलेगा |
ऐसी परिस्थिति में किसी ताले को उसकी अपनी चाभी से न खोलकर अपितु किन्हीं दूसरी लाखों करोड़ों चाभियों से खोलने का प्रयास किया जाता रहे !ऐसे परिणामशून्य उद्देश्यभ्रष्ट निरर्थककार्य को कोई रिसर्च मान कर थोपना चाहे तो समाज ये कैसे स्वीकार कर लेगा | समाज यह भी तो देखना चाहेगा कि इस रिसर्च से निकला क्या है और वह सही कितना घटित होता है |वैसे भी कोई ताला यदि किसी चाभी से खुलने लग जाएगा तब तो उस ताले का
तालापन ही समाप्त हो जाएगा |
इसलिए उचित तो यह है कि यदि तमाम प्रयासों को करने का उद्देश्य ताला खोलना ही है तब तो जिस दूसरी चाभी से ताला खुल जा रहा होता है उसी ताली को स्वीकार करके इस प्रयत्न को संपूर्ण मान लिया जाना चाहिए | ऐसा करके यदि यह सोचा जाने लगे कि यह ताला जिस ताली से खुल रहा है चूँकि वह किसी दूसरे के द्वारा खोजी गई है इसलिए ऐसे किसी दूसरे के द्वारा की गई खोज को मान्यता देने से अच्छा है कि रिसर्चरच के नाम पर कुछ भी क्यों न करते रहें फिर भी ताले की वास्तविक चाभी भले न खोजी जा सके ,जिसके परिणाम स्वरूप ताला भले खुले अपने रिसर्च में समय और पैसा निरर्थक व्यय होता रहे फिर भी विज्ञान हमारी शोध पद्धति को ही माना जाए और रिसर्च हमारे ताला खोलने के प्रयासों को ही माना जाए भले हमसे ताला खुले या न खुले किंतु दूसरा कोई व्यक्ति यदि आसानी से वह ताला खोल दे तो भी उसके प्रयत्न को पहचान न मिलने दी जाए |
ऐसी परिस्थिति में जनता की आवश्यकता तो ताला खोलने की है यह कार्य जिन वैज्ञानिकों को सौंपा जाए फिर भी वे न खोल पावें और जो खोल पावे उसे न खोलने दिया जाए | इससे तो समय संसाधनों एवं धन की बहुत सारी बर्बादी होने के बाद भी ताला तो नहीं ही खुलता है | इतने सारे रिसर्चों के बाद भी जनता की आवश्यकताओं पूर्ति तो नहीं ही हो पाती है |
इसी प्रक्रिया के द्वारा कोरोना जैसी महामारियों तथा भूकंप आँधी तूफ़ान वर्षा बाढ़ जैसी प्राकृतिक घटनाओं के विषय में सदियों से चलाए जा रहे से अनुसंधानों से न अभी तक कुछ निकल पाया है और न ही भविष्य में किसी ऐसे सार्थक अनुसंधान की उम्मींद की जानी चाहिए जो ऐसी घटनाओं के विषय में भविष्य में जनता के किसी काम आने लायक ही हो |
सामान्य तीर तुक्कों से यदि महामारी संक्रमित लोगों को रोग मुक्ति दिलाना संभव ही होता तो महामारी किस बात की ,फिर तो सामान्य रोगों की श्रेणी में महामारी जनित रोग भी होते |वस्तुतः महामारी उतनी भयावह नहीं थी जितना कि महामारी से संबंधित सार्थक अनुसंधानों का अभाव था|ऐसी कोई वैज्ञानिक अनुसंधान विधा ही नहीं दिखाई पड़ी जिसके द्वारा महामारी के विषय में कोई भी जानकारी जुटाना संभव होता|
विज्ञान के अभाव में भटकते अनुसंधान !
प्रत्येक घटना मनुष्यकृत हो या प्राकृतिक उसकी कोई न कोई पटकथा अवश्य होती है उसी के अनुशार उस घटना को घटित होते देखा जाता है | किसी भी नाटक या फ़िल्म में उसकी पटकथा ही उस नाटक या फ़िल्म का प्राण होती है उसी के अनुसार उस नाटक या फ़िल्म में पात्रों का चयन होता है उसमें किस पात्र की क्या भूमिका होगी यह उसी पटकथा के आधार पर निश्चित होता है उसी के अनुसार पात्र अपना अपना अभिनय करते रहते हैं |
वह पटकथा लिखने वाला व्यक्ति उस फ़िल्म या नाटक में अभिनय भी करे निश्चित नहीं होता है कई बार तो संपूर्ण नाटक या फ़िल्म बन जाने के बाद भी पटकथा लिखने वाला व्यक्ति पूरी तरह अप्रत्यक्ष बना रहता है किंतु उस सारी कथा वस्तु का वही रचयिता होता है |
प्रत्येक फ़िल्म या नाटक की कथा वस्तु समझने के लिए उस फ़िल्म या नाटक को अच्छी प्रकार से देखना पड़ेगा उसके आधार पर उस कहानी को समझा जा सकता है | कुछ लोग किसी फ़िल्म या नाटक को कई कई बार देखा होता है इसलिए उन्हें सारा कथानक याद हो जाता है | इसीलिए वे जब उस फ़िल्म या नाटक को देखने बैठते हैं तब आगे आगे बोलते देखा जाता है कि अब ये पात्र ऐसा बोलेगा या ये करेगा वो वैसे बोलेगा और वैसा करेगा और वैसा ही होता जाता है| यह मनुष्यकृत फ़िल्मों नाटकों आदि में तो चल जाती है किंतु इसका अनुशरण वैज्ञानिक अनुसंधानों में नहीं किया जा सकता है |
पिछली बार ऐसा हुआ था इसलिए अबकी बार भी वैसा ही होगा या इतने वर्षों से इस क्षेत्र में इस निर्धारित समय के बीच इतने सेंटीमीटर बारिश होती रही है इसलिए अबकी बार भी इतनी ही बारिश हो सकती है | इस रेगिस्तान में कभी बारिश नहीं होती रही है इसलिए अभी भी ऐसा ही हो सकता है |मानसून पिछली बार इस तारीख को आया या गया था तो अबकी बार भी उस तारीख को ही आए जाएगा | पिछली महामारी के समय इस इस प्रकार से संक्रमण बढ़ा था अबकी बार ही ऐसा ही हो सकता है |पिछली बार की महामारी में इतने इतने अंतराल में इतनी इतनी लहरें आई थीं इसलिए अबकी बार भी संभवतः वैसा ही होगा आदि आदि बहुत सारी ऐसी बातें हैं जो वैज्ञानिक अनुसंधानों के नाम पर अपनाई जाती हैं जिनका विज्ञान भावना से कोई लेना देना ही नहीं होता है | इसके बाद जब ऐसे तीर तुक्के गलत निकलते हैं तो उसके लिए जलवायुपरिवर्तन जैसी चीजों को जिम्मेदार बता दिया जाता है |जलवायुपरिवर्तन जैसी कोई चीज है या नहीं मौसम आदि पर इसका कोई प्रभाव बज्रपात आदि पड़ता भी है या नहीं ये तो बाद की बात है जब इसके विषय में कोई वैज्ञानिक अनुसंधान पद्धति खोज ली जाएगी तब इसके विषय में सोच लिया जाएगा,अभी तो फिलहाल यही देखा जाना चाहिए कि महामारी मौसम जैसी घटनाओं के विषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए जो जो कुछ किया जाता है उसका वैज्ञानिक आधार क्या है ?उनमें यदि वैज्ञानिकता का अभाव है तो उनके गलत निकल जाने पर आश्चर्य क्यों होता है |उसका कारण जलवायुपरिवर्तन को बता देने की जल्दबाजी क्यों होती है | उसका भी कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता है |
वैज्ञानिक अनुसंधानों को इस तरह से चलाया भी नहीं जा सकता है | ऐसा करने से तो भूकंप आँधी तूफ़ान सूखा वर्षा बाढ़ या महामारी जैसी अचानक घटित होने वाली घटनाओं के विषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने की कभी कल्पना ही नहीं की जा सकती है क्योंकि इसमें वो पद्धति लगी ही नहीं हो सकती है कि पिछले वर्ष या वर्षों में ऐसा ऐसा होता रहा है इसलिए अबकी बार भी ऐसा ऐसा होगा क्योंकि ऐसी घटनाएँ हमेंशा न घटित होकर कभी कभी और अचानक ही घटित होती हैं | इसलिए इसमें उसप्रकार के तीर तुक्कों से काम कैसे चलाया जा सकता है कि हर वर्ष वैसा होता था इसलिए अबकी बार भी ऐसा ही सकता है | ऐसी सुविधा न होने के कारण इन घटनाओं को जलवायुपरिवर्तन जनित बता देना वैज्ञानिक अनुसंधानों के क्षेत्र में एक प्रकार का पलायन बाद है |इससे बचा जाना चाहिए और परिस्थितियों का सामना किया जाना चाहिए | कोरोना महामारी वैज्ञानिकअनुसंधानों के लिए एक बड़ी चुनौती की तरह है | इसलिए इसे यूँ ही तो नहीं भुलाया जा सकता है | ऐसी घटनाओं की वो पटकथा खोजनी होगी जिसके आधार पर इस प्रकार की प्राकृतिक घटनाएँ घटित हो रही होती हैं |
अनुसंधानों के लिए आवश्यक है प्राकृतिक घटनाओं के वास्तविक कारणों की खोज !
जिस प्रकार से किसी ट्रेन को जाते हुए देखकर इन बातों का अनुमान पूर्वानुमान आदि कतई नहीं लगाया जा सकता है कि ये कहाँ तक जाएगी किस रास्ते से जाएगी प्रतिदिन जाएगी या नहीं जाएगी या सप्ताह में कुछ दिन ही जाएगी | इसके जाने का समय क्या होगा आदि किंतु यदि ट्रेन विषयक समय सारिणी के साथ साथ वह पटकथा भी मिल जाए जिसके आधार पर ट्रेन संचालित होती है उसमें उस ट्रेन के विषय की संपूर्ण जानकारी लिखी होती है | उसी के आधार पर ट्रेन को देखे बिना भी ट्रेन के विषय की संपूर्ण सही जानकारी सहज रूप से प्राप्त की जा सकती है |जिसे केवल ट्रेन को देखकर प्राप्त किया जाना संभव नहीं होता है |
इसी प्रकार से अति विशाल आकाश में विमान उड़ रहे होते हैं वे किसी भी तरफ उड़कर जा सकते हैं उनके लिए चारों ओर आसमान खाली ही खाली होता है | इसलिए आकाश में विमानों को उड़ते देखकर यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि ये कब कहाँ पहुँचेगा कहाँ कितनी देर रुकेगा आदि | प्रतिदिन का इसका क्या क्रम होगा इस बात का भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता है किंतु उसी विमान की समय सारिणी एवं पटकथा आदि यदि खोज ली जाए तो विमान को देखे बिना भी उसके विषय में ऐसी सभी बातों की सही सही जानकारी आसानी से प्राप्त की जा सकती है |
इसी प्रकार से आकाश में उड़ते बादलों आँधी तूफानों चक्रवातों आदि को उपग्रहों रडारों की मदद से या प्रत्यक्ष रूप से देखकर यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि ये कब कहाँ पहुँचेंगे !कहाँ कितने समय तक रहेंगे इनका किस देश प्रदेश आदि में कैसा वर्ताव रहेगा | ऐसी घटनाओं का प्रतिदिन का क्या क्रम होगा इन बातों का अनुमान पूर्वानुमान आदि नहीं लगाया जा सकता है किंतु उन्हीं प्राकृतिक घटनाओं की समय सारिणी पटकथा आदि खोज ली जाए तो घटनाओं को प्रत्यक्ष रूप से देखे बिना भी उन घटनाओं के विषय में सही सही जानकारी आसानी से प्राप्त की जा सकती है |
इसलिए महामारियों भूकंपों आँधी तूफानों चक्रवातों एवं सूखा वर्षा बाढ़ जैसी घटनाओं के विषय में किसी भी प्रकार की जानकारी जुटाने या अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए उन घटनाओं की समय सारिणी पटकथा आदि की खोज किया जाना नितांत आवश्यक है इसके बिना ऐसी किसी घटना के विषय में कुछ भी पता लग पाना संभव नहीं है|
किसी विषय की समयबद्ध पटकथा खोजा जाना ही उसके विषय का वास्तविक वैज्ञानिक अनुसंधान होता है | इसके बिना प्राकृतिक विषयों में वैज्ञानिक अनुसंधान संभव ही नहीं हैं | यही वह प्रमुख कारण है जिससे महामारी से लेकर मौसम तक जितने भी अनुसंधान किए जा रहे हैं उनके आधार पर जो भी अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जा रहे हैं उनमें वैज्ञानिकता कम एवं कल्पित किस्से कहानियाँ अधिक होते हैं | इसीलिए उनका उनके द्वारा किए गए अनुसंधानों का घटनाओं के साथ कोई मेल नहीं खाता है और वे प्रायः गलत निकलते देखे जाते हैं |
महामारी का सामना करने की तैयारियाँ क्या थीं ?
वैज्ञानिकों के द्वारा महामारी के विषय में अभी तक किए गए अनुसंधानों को यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो वे कितने प्रतिशत सफल हुए हैं | जनता के जीवन से संबंधित संभावित सभी प्रकार के संकटों को कम करने या जीवन को आसान बनाने के लिए वैज्ञानिकों के द्वारा किए जाने वाले सभी प्रकार के अनुसंधान आवश्यक हैं किंतु केवल अनुसंधानों से क्या होगा उनकी सार्थकता भी तो सिद्ध होनी चाहिए | अनुसंधानों की सार्थकता बहुत महत्त्व रखती है |
महामारी जैसी घटनाएँ अचानक घटित होने लगती हैं जिससे बड़ी तेजी से जनधन हानि होने लगती है | उस समय महामारी के स्वभाव को समझने के लिए समय बहुत कम मिल पाता है उसके बाद बचाव के लिए औषधि खोजना और उसका अच्छी प्रकार से परीक्षण करना उतने कम समय में अत्यंत कठिन होता है | उसके बाद इतनी अधिक मात्रा में उस औषधि का तुरंत निर्माण करके जन जन तक पहुँचाना ताकि प्रत्येक व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके |ये सब अत्यंत कठिन काम जो बहुत कम समय में करना होता है |औषधि अनुसंधान एवं निर्माण प्रक्रिया विशुद्ध वैज्ञानिक होने के बाद भी उनके साथ सरकारों की संपूर्ण सहभागिता रहती है जिसके बिना यह इतना कठिन कार्य संभव भी नहीं होता है |
महामारी पीड़त समाज की सुरक्षा के साथ साथ उन्हें जीवन यापन के लिए आवश्यक वस्तुएँ संसाधन आदि इतने कम समय में उपलब्ध करवाने होते हैं | इसके अतिरिक्त भी महामारी जैसी घटनाओं के समय सरकारों को और भी बहुत सारी जिम्मेदारियाँ निभानी पड़ती हैं |
समाज को भी ऐसी आकस्मिक आपदाओं से अपने और अपने परिवारों को सुरक्षित रखने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर भी बहुत सारे इंतिजाम तुरंत करने होते हैं |सारे आवश्यक संसाधन इतने कम समय में जुटाने होते हैं |
समाज का अत्यंत गरीब वर्ग जिसे रोज खाना रोज कमाना होता है उस वर्ग के पास संचित धन तो होता नहीं है कि वो कुछ दिन घर बैठ कर अपना जीवन यापन कर ले |समय रहते उसे यदि महामारी जैसी आपदाओं के विषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि पता लग जाएँ तो वह अपने एवं अपने परिवार के भरण पोषण के लिए सुरक्षित स्थान खोज सकता है |
फैक्ट्री मालिकों एवं अन्य व्यापारी वर्ग को काफी बड़ी मात्रा में कर्जा उठाकर कई बार व्यापार करना होता है जिसका ब्याज भी देना होता है | बड़ी मात्रा में कर्मचारियों को बेतन देना होता है | कार्य संचालन के लिए अधिक मात्रा में माल संचय करके रखना होता है |कोरोना जैसी महामारी के विषय में उन्हें अचानक अनिश्चित काल के लिए कार्य बंद करना पड़ा जिसमें सभी प्रकार से बहुत नुक्सान हुआ | यदि उन्हें महामारी के विषय में पहले से अनुमान पूर्वानुमान आदि पता लग जाते तो इतना बड़ा नुक्सान होने से उनका भी बचाव हो सकता था |
ऐसे समय में वैज्ञानिकों सरकारों एवं समाज को समय की सबसे बड़ी आवश्यकता होती है ताकि ऐसे संकट काल के लिए आवश्यक कार्यों को समय से पूरा किया जा सके| इसके लिए महामारी जैसी बड़ी घटनाओं के विषय में सही सही अनुमान पूर्वानुमान आदि जितने पहले से पता लग जाएँ सभी के लिए उतना ही हितकर माना गया है |
ऐसी परिस्थिति में इस बात की गहन समीक्षा होनी ही चाहिए कि वैज्ञानिकों के द्वारा महामारी से संबंधित जिस भी विषय में जितने भी अनुमान पूर्वानुमान आदि बताए गए उनमें से जितने प्रतिशत सही निकले महामारी का सामना करने की वैज्ञानिक तैयारियों को उतने ही प्रतिशत सफल माना जाना चाहिए |
महामारी वैज्ञानिकों के द्वारा लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान कितने सही निकले ?
समय समय पर दिए गए वैज्ञानिकों के वक्तव्य see more... https://anusandhanvajpaee.blogspot.com/2022/04/blog-post.html
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