महामारी के समय में प्रकृति में अप्रत्याशित बदलाव -

     कोरोना महामारी के समय एक डेढ़ वर्ष में केवल भारत में ही एक हजार से अधिक भूकंप आए हैं ऐसा क्यों हुआ क्या इनसे महामारी का कोई संबंध है इस संबंध को खोजना अनुसंधानों की जिम्मेदारी है | इन भूकंपों का महामारी से कोई संबंध  नहीं है तो इसी समय इतने अधिक भूकंपों के आने का कारण क्या  है | वस्तुतः भूकंपों से संबंधित अनुसंधान इतने लंबे समय से चलाए जा रहे हैं उनसे जनता को कितनी मदद पहुँचाई जा सकी है इस बात की समीक्षा तो होनी ही चाहिए |वैज्ञानिक अनुसंधानों से भूकंपों को रोकना तो संभव है ही नहीं केवल इनका पूर्वानुमान ही लगाने के लिए बड़े बड़े अनुसंधान चलाए जा रहे हैं | कोई भूकंप कब आएगा इसका पूर्वानुमान लगाना अभी तक संभव नहीं हो पाया है और न ही वैज्ञानिकों के द्वारा ऐसे कोई दावे किए ही जा रहे हैं | दूसरी बात भूकंप आते क्यों हैं उसका कारण खोजना सबसे कठिन काम है |

       2018 अप्रैल मई जून में आने वाले पूर्वोत्तर भारत के हिंसक  आँधी तूफान  आए !ऐसे ही अगस्त 2018 में केरल में भीषण बाढ़ आई !इनघटनाओं के तुरंत बाद महामारी प्रारंभ हुई | 2020 और 2021 में सर्दी के सीजन  सर्दी  बहुत कम हुई गर्मी के सीजन में मई जून तक वर्षा होती रहने  कारण गर्मी बहुत कम हुई | ऐसा क्यों हुआ क्या इनसे महामारी का कोई संबंध है इस संबंध को खोजना अनुसंधानों की जिम्मेदारी है | यदि ऐसी प्राकृतिक घटनाओं का महामारी से कोई संबंध  नहीं है तो इसी समय इतने अधिक ऐसी ऋतु विपरीत घटनाओं के घटित होने का कारण क्या  है |इस संबंध  को खोजने की वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी है | 

    आँधी तूफानों के विषय में जिन मौसम वैज्ञानिकों के द्वारा कभी कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकी थी उन्हीं मौसम वैज्ञानिकों के द्वारा 8 मई 2018 को भीषण आँधी तूफ़ान आने की भविष्यवाणी कर दी गई ,मौसम वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी से भयभीत सरकारों ने दिल्ली और दिल्ली के आसपास के स्कूल कालेज बंद करवा  दिए जबकि हवा का एक झोंका  भी नहीं आया | जिसके विषय में कभी कोई पूर्वानुमान नहीं बताया जा सका था | मौसमसंबंधी इस प्रकार की प्राकृतिक घटनाओं का उसके तुरंत बाद आई कोरोना महामारी से कोई संबंध था या नहीं | इस बात का  पता लगाना भी उन्होंने  आवश्यक नहीं समझा  होगा |         

    बढ़ते वायुप्रदूषण  का महामारी से कोई संबंध था या नहीं 

      वायुप्रदूषण पिछले कुछ  वर्षों से निरंतर बढ़ते देखा रहा है किंतु इसके विषय में पूर्वानुमान लगाना तो दूर आज तक यही नहीं पता लगाया जा सका कि वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार वास्तविक कारण क्या हैं?दीपावली के पटाखों को वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार बताने वाले यह नहीं सोचते कि चीन में तो दीवाली नहीं मनती वहाँ क्यों बढ़ा हुआ है वायु प्रदूषण | इसके  साथ ही इस बात  का भी  पता लगाया जाना चाहिए कि विगत कुछ वर्षों में क्रमिक रूप से बढ़ते जा रहे वायु प्रदूषण का कोरोना महामारी से कोई संबंध था या नहीं इसका भी पता लगाया जाना  चाहिए | कुल मिलाकर वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा न  तो वायुप्रदूषण  बढ़ने का  कारण खोजा  जा सका और न ही उसके विषय में कोई  पूर्वानुमान ही लगाया जा सका ऐसी परिस्थिति में यदि महामारी पैदा होने का कारण वायु प्रदूषण ही हो तो भी इस विषय में  जानकारी जुटाने  के लिए  सरकारों  के पास और दूसरा विकल्प भी क्या  है ? ऐसी परिस्थिति में  महामारी और वायुप्रदूषण के आपसी संबंध को खोज पाना असंभव सा है | 

वैज्ञानिकों के पूर्वानुमान गलत क्यों निकलते रहे ?
   उसी समय सरकारों को सावधान कर दिया जाना चाहिए था !कोई भी विमान चालक जब विमान से नियंत्रण  खो देता  है तब वो भी कुछ न करना चाहे तो ऐसी अप्रत्याशित घटनाओं के लिए मौसम वालों की  तरह  ही जलवायु परिवर्तन  जैसे किसी शब्द को कारण मान कर चुप बैठ जाए |किंतु ऐसी परिस्थिति में विमानचालक कर्तव्य का  पालन करना अपना धर्म समझता है |   इस  संबंधित विभागों को तुरंत सूचित कर देता है वह उस  अप्रत्याशित घटना  के दुष्परिणामों का  तुरंत अनुमान लगाकर संबंधित विभागों को तुरंत संभावित परिस्थितियों की सूचना देता है उससे बचाव का प्रयास स्वयं भी  करता है विमान यात्रियों को भी  सावधान  करता है |सरकार के संबंधित विभागों को तुरंत सूचित कर देता है | 
05 फरवरी 2020 : 2020 में रिकॉर्ड की गई इतिहास की सबसे गर्म जनवरी !    

यूरोप में जनवरी का तापमान औसत से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया, जबकि  पूर्वोत्तर यूरोप के कई हिस्सों में औसत से 6 डिग्री सेल्सियस अधिक रिकॉर्ड किया गया !जनवरी माह का वैश्विक तापमान अपने चरम पर पहुंच गया था।विश्व मौसम विज्ञान संगठन द्वारा किये विश्लेषण के अनुसार 2019 को मानव इतिहास के दूसरा सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज किया गया था। आंकड़ों के अनुसार  2019 के वार्षिक वैश्विक तापमान में औसत (1850 से 1900 के औसत तापमान) से 1.1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है। जबकि 2016 का नाम अभी भी रिकॉर्ड में सबसे गर्म साल के रूप में दर्ज है। आंकड़ें दिखाते हैं कि 2010 से 2019 के बीच पिछले पांच साल रिकॉर्ड के सबसे गर्म वर्ष रहे हैं।

5  मई 2020 :वैज्ञानिकों ने यह खुलासा किया है कि  कोरोना के बीच पाँच गुणा तेजी  से सूरज की रोशनी घटी  है |  

12 मई 2020 :इस बार अप्रैल में इतनी बारिश हुई जितनी पहले कभी नहीं हुई थी। अब मई की बारिश ने भी चौका दिया है। इन दो माह में अब तक कुल 51.4 मिमी बारिश हो चुकी है। 


  कृषि की समस्याएँ  बढ़ीं -
जलवायु परिवर्तन की वजह से भारी नुकसान :भारतीय मौसम विज्ञान विभाग  के अनुसार इस रिपोर्ट को तैयार करने में 40 साल के डेटा की छानबीन की कई. इसमें मॉनसून के आने और उसके जाने की तारीख में हुए बदलाव की वजह ढूंढने के लिए (1980-1999) और (2000-2019) के बीच की रिपोर्ट का अध्ययन किया. 
    इसके बारे में  IMD के सीनियर साइंटिस्ट डी आर पाटिल कहते हैं कि पिछले 40 साल के रेनफॉल डाटा इन्वेस्टीगेशन से सामने आया है कि इसके पीछे क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वॉर्मिंग एक बड़ी वजह है | मॉनसून की विदाई अब देरी से हो रही है. मॉनसून की वापसी पहले 1 सितंबर से शुरू हो जाती थी, जो 17 सितंबर के करीब विदा होता है. लेकिन अब इसमें देरी देखी जा रही है. इस बार की बात करें तो मॉनसून की विदाई 6 अक्टूबर को कही गई और अब 26 अक्टूबर तक देश से दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के पूरी तरह विदा होने के संकेत मिले हैं. इन बदलावों की वजह से खेती को काफी नुकसान पहुंच रहा है| 
24 सितंबर 2020  प्रकाशित -फसल में कीट प्रकोप  , लॉकडाउन के कारण खेतों तक भी नहीं जा पा रहे किसान !
14 -11-2021  प्रकाशित - असमय बारिश और नमी बढ़ने से कीट-रोगों की चपेट में आई धान की फसल !जलवायु परिवर्तन के कारण कीट और अरहर की फलियाँ संक्रमित लार्वा जैसे रोगों में वृद्धि हुई है. खरीफ में यह आखिरी फसल है और किसान इसमें ज्यादा उत्पादन की उम्मीद कर रहे हैं. हालांकि इसके लिए कीट प्रबंधन ही एकमात्र विकल्प है और किसानों को इसे लागू करने की जरूरत है. कृषि विभाग ने एक प्रणाली तैयार की है, जिसके अनुसार यदि उपाय लागू किए जाते हैं तो उत्पादन में वृद्धि हो सकती है.


टिड्डियों का आतंक  - 

      टिड्डियाँ  संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़, साल 2003-05 के बीच में भी टिड्डों की संख्या में ऐसी ही बढ़ोतरी देखी गई थी जिससे पश्चिमी अफ्रीका की खेती को ढाई अरब डॉलर का नुकसान हुआ था.

       1812 से भारत टिड्डियों के हमले झेलते आ रहा है।1812 से 1889 के बीच कम से कम 8 बार देश में टिड्डियों के झुंड ने बर्बादी फैलाई है. इसके बाद 1896 से 1997 के बीच एक और हमला हुआ था | वैश्विक दृष्टि से देखा जाए तो 1926 से 31 के दौरान टिड्डियों के हमले हुए । इसके बाद 1940 से 1946 और 1949 से 1955 के बीच भी टिड्डियों के हमले ले  हुए ।1959 से 1962 के बीच टिड्डी दल ने आक्रमण किया | 1962 के बाद टिड्डियों का कोई ऐसा हमला नहीं हुआ, जो लगातार तीन-चार साल तक चला हो ।यद्यपि 1978 में एवं 1993 में भी मध्यम हमला हुआ था।1998, 2002, 2005, 2007 और 2010 में भी टिड्डियों के हमले हुए थे, लेकिन ये बहुत छोटे थे।इसके बाद 2020 में टिड्डियों का हमला हुआ | अब सवाल यह भी है कि टिड्डियों के हमले इतने व्यापक कैसे हो गए?इसका एक प्रमुख कारण 2018-19 में आए चक्रवाती तूफ़ान और भीषण बारिश को बताया जाता है |ये सब होने का कारण जलवायुपरिवर्तन को बताया जाता है और  जलवायु परिवर्तन का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता | ऐसी परिस्थिति में यदि   कोरोना  महामारी के घटित होने  का कारण जलवायु परिवर्तन ही हो तो महामारी के विषय में कोई अनुमान  या पूर्वानुमान लगाना  नहीं होगा  और न ही इसके विषय में  किसी कारण का पता लगाया जा सकता है | ऐसी परिस्थिति में महामारी के  विषय में अनुसंधान करना आसान तो नहीं  है |  
 
चूहों का आतंक बढ़ा :-

26 Jul 2016 को प्रकाशित चूहों से संक्रमण और बीमारियां तेजी से फैलती हैं इसलिए प्रधानमंत्री जॉन की ने 2050 तक चूहों और अन्‍य उपद्रवी जानवरों से छुटकारा पाने की महत्‍वकांक्षी योजना की घोषणा की है | 

28-5-2021चूहों  जन्मदर बढ़ी - 29 -5 -2021 ऑस्ट्रेलिया में चूहों से हाहाकार, खेतों को किया बर्बाद अब घर में लगा रहे आग, भारत को 5 हजार लीटर जहर का ऑर्डर !आस्ट्रेलिया चूहों से बहुत ज्यादा परेशान है. फैक्ट्री और खेतों से निकलने वाले इन चूहों की संख्या लाखों में है, जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया के लोगों को न सिर्फ परेशान कर दिया है बल्कि वहां लोग चूहों से डरे हुए हैं.| ऑस्ट्रेलिया के कृषि मंत्री एडम मार्शल ने कहा है कि 'अगर हम वसंत तक चूहों की संख्या को कम नहीं कर पाते हैं तो ग्रामीण और क्षेत्रीय साउथ वेल्स में आर्थिक और सामाजिक संकट का सामना करना पड़ सकता है।' । लाखों की तादाद में चूहों ने किसानों और फैक्ट्री मालिकों को परेशान कर रखा है। लाखों चूहें ऑस्ट्रेलिया के अलग अलग फैक्ट्री और खेतों से निकल रहे हैं  | 

Oct 24, 2021यूपी के कानपुर में चूहों ने करीब 40 करोड़ की पुल को कुतर दिया है. कानपुर में 4 साल पहले राज्य सेतु निगम की ओर से खपरा मोहाल रेलवे ओवरब्रिज बनाया गया था. चूहों की वजह से पुल का एक हिस्सा भरभरा कर गिर गया है | 

 जुलाई 2020 में प्रकाशित हुआ कि चीन में ब्यूबोनिक प्लेग का मामला सामने आने के बाद चेतावनी जारी की गई है | 

सन 2020 में प्रकाशित -यूके में लॉकडाउन में डेढ़ फुट लम्बे गुस्सैल चूहों का आतंक; भूख ऐसी कि एक-दूसरे को खा रहे, इन पर जहर भी बेअसर हो रहा है | ब्रिटेन में चूहे इतने बढ़ गए, जितने कि 200 साल पहले की औद्योगिक क्रांति के दौरान भी नहीं थे |लॉकडाउन में चूहे खाने और रहने के नए ठिकाने ढूंढ़ने में लगे हैं |बताया जाता है कि चूहों से 55 तरह की बीमारियां फैलती है | दुनियाभर में लॉकडाउन के दौरान जानवरों के नए रूप देखने को मिले हैं। लेकिन, ब्रिटेनवासी कोरोना के साथ-साथ बड़े चूहों से बेहद परेशान और खौफ में हैं। 18 इंच तक लम्बे इन चूहों को जाइंट रेट कहा जाता है और लॉकडाउन के दौरान इन्होंने अपने व्यवहार को अधिक आक्रामक बना लिया है | बीते दो महीनों से ये सीवर-अंडरग्राउंड नालियों से निकल कर रहवासी इलाकों में घुस रहे हैं। बंद शहरों से दूर ये उपनगरीय कस्बों की ओर बढ़ रहे हैं। पता चला है कि ये इतने भूखे हैं कि अब एक-दूसरे को खाने लगे हैं। इन पर रेट पॉयजन का भी असर नहीं हो रहा है।

भारत में भी मध्य प्रदेश, दिल्ली, पंजाब और राजस्थान समेत कई राज्यों से चूहों के आतंक और करोड़ों के माल की नुकसान की खबरें मिली हैं, हालांकि हमारे यहाँ के चूहे ब्रिटेन के चूहे जितने बड़े नहीं हैं।

ब्रिटेन के चूहों की मुंह से लेकर पूंछ तक की लंबाई करीब 18 से 20 इंच तक देखी गई है। ब्रिटेन ही नहीं, दुनिया के अन्य देश भी लॉकडाउन के दौरान चूहों के आतंक का सामना कर रहे हैं। अमेरिका में, सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल ने चूहों के आक्रामक हो रहे व्यवहार के बारे में लोगों को सचेत किया है।ब्रिटिश पेस्ट कंट्रोल एसोसिएशन के एक सर्वे से पता चला है कि ब्रिटेन में बड़े चूहों के उपद्रव की घटनाओं में 50 फीसदी का इजाफा हुआ है। द सन अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में चूहे पकड़ने वालों ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा है कि उनका काम बढ़ गया है। एसोसिएशन की टेक्निकल ऑफिसर नताली बुंगे के मुताबिक: "हमारे पास अब तक ये रिपोर्ट आती थी कि चूहे खाली इमारतों में ठिकाने बना रहे हैं लेकिन,अब ऐसा लगता है कि उनके रहवास का पैटर्न भी बदल रहा है | मैनचेस्टर के रैट कैचर मार्टिन किर्कब्राइड ने टेलीग्राफ को बताया कि, ब्रिटेन में चूहे इतने बढ़ गए हैं जितने कि 200 साल पहले की औद्योगिक क्रांति के दौरान भी नहीं थे। वैज्ञानिकों ने लॉकडाउन के शुरू होने के बाद से ही यहां के उपनगरों में बड़े चूहों की आबादी में बढ़ोतरी देखी है। कुतरने वाले जीवों पर पीएचडी करने वाले अर्बन रोडेन्टोलॉजिस्ट बॉबी कोरिगन कहते हैं कि:हमने मानव जाति के इतिहास में देखा है, जिसमें लोग जमीन पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं। वे पूरी सेना के साथ धावा बोलते हैं और जमीन हथियाने के लिए आखिरी सांस तक लड़ते हैं। और, चूहे भी अब ऐसा ही कर रहे हैं।दिलचस्प बात यह है कि चीनी कैलेंडर के हिसाब से कोरोनावायरस की भेंट चढ़ा साल 2020 चूहों का साल माना गया है। हर 12 साल में एक बार आने वाला चूहों का ये साल 25 जनवरी से शुरू होकर 21 फरवरी 2021 तक चलेगा। हालांकि चीन में जनवरी से ही कोरोना संक्रमण तेजी से फैला और नव वर्ष का जश्न खराब हो गया था। 

 

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